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देश के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार और दो जून की रोटी

देश के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार और 

दो जून की रोटी ?


शेखर खान पत्रकार 

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी का वह दायित्व है जिसमें व्यक्ति दिन-रात सच को सामने लाने का प्रयास करता है। लेकिन इस जिम्मेदारी के पीछे एक ऐसा संघर्ष भी छिपा होता है, जिसे आम लोग अक्सर नहीं देख पाते।

एक पत्रकार सुबह घर से निकलते समय यह नहीं जानता कि दिन उसे किस दिशा में ले जाएगा। कहीं दुर्घटना की सूचना मिल सकती है, कहीं किसी गरीब की समस्या, कहीं भ्रष्टाचार की शिकायत तो कहीं किसी सामाजिक मुद्दे की पड़ताल। दूसरों की आवाज बनने वाला पत्रकार अक्सर अपनी परेशानियों को खुद तक ही सीमित रखता है। जमीनी स्तर पर काम करने वाले अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में अपना दायित्व निभाते हैं। उन्हें खबर जुटाने से लेकर फोटो, वीडियो, संपादन और सोशल मीडिया तक की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। कई बार उन्हें अपने निजी खर्च पर दूर-दराज क्षेत्रों तक जाना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद वे समाज के हित में काम करना नहीं छोड़ते।

पत्रकार भी एक परिवार का सदस्य होता है। उसके सामने भी बच्चों की शिक्षा, घर का खर्च, बढ़ती महंगाई और भविष्य की चिंताएं होती हैं। फिर भी जब समाज में कोई घटना घटती है, तो वह सबसे पहले मौके पर पहुंचने की कोशिश करता है ताकि सही जानकारी लोगों तक पहुंच सके।


पत्रकारिता का असली उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना और जनहित के मुद्दों को सामने लाना है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी पत्रकार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटता। वह जानता है कि उसकी एक खबर किसी जरूरतमंद की मदद कर सकती है, किसी समस्या का समाधान बन सकती है और किसी पीड़ित को न्याय दिलाने में सहायक हो सकती है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज पत्रकारों के योगदान को समझे और उनके संघर्षों को भी महसूस करे। समाचारों के पीछे केवल शब्द नहीं होते, बल्कि किसी पत्रकार की मेहनत, समय, समर्पण और जिम्मेदारी भी होती है।


दो जून की रोटी की चिंता और समाज के प्रति अपने कर्तव्य के बीच संतुलन बनाते हुए पत्रकार निरंतर आगे बढ़ता रहता है। यही उसकी पहचान है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी।



                वरिष्ठ पत्रकार सुनील मिश्रा

मैं यह नहीं कहता कि हर पत्रकार सही है। हर पेशे की तरह पत्रकारिता में भी कुछ लोग अपने कर्तव्यों से भटक जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा पत्रकार समाज गलत है। आज भी अनेक पत्रकार निष्पक्षता, ईमानदारी और साहस के साथ समाज की आवाज़ बनकर काम कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार, अन्याय और जनसमस्याओं को सामने लाकर लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। कुछ गलत लोगों की वजह से पूरे पेशे को दोष देना उचित नहीं है। हमें अच्छे और जिम्मेदार पत्रकारों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि सच्ची पत्रकारिता समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करती है

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